ISC Hindi 2016 Class-12 Previous Year Question Papers

दुकानदार ने दवा निकालकर दे दी और पैसे माँगे। उस वृद्ध के पास 50 रुपये कम थे। इस पर दुकानदार ने दवा वापस लेकर एक तरफ रख दी। वृद्ध गुहार करता रहा कि वह पैसे बाद में दे जायेगा इस समय ऑपरेशन चल रहा है। मुझे उस पर दया आई और उसके शब्दों में सत्यता का आभास हुआ। दवा लेकर जाना उसके लिए कितना आवश्यक था यह समझ में आ रहा था। उसने कातर दृष्टि से देखा पर किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। वह रुआँसा हो गया। मैंने दुकानदार से कहा कि वह उसको दवा दे दे बाकी के पैसे मैं दे दूंगा। दुकानदार ने उसे दवा दे दी। उसने धन्यवाद सूचक दृष्टि से देखा और चला गया। मैंने अपनी जेब देखी तो उसमें उतने पैसे नहीं थे। अतः मैंने अपने हाथ की घड़ी उतारकर दुकानदार को दी। __ उसने आश्चर्य से मुझे देखा और घड़ी लेकर एक लिफाफे में रख दी। मैंने उससे कहा कि रुपये देकर घड़ी ले जाऊँगा।

मैं घर आ गया और यह घटना पिताजी को सुनाई। वे मेरे इस कृत्य पर बहुत खुश हुए और हर्ष के मारे मुझे गोद में उठा लिया। वे बड़े सहृदय हैं और इस प्रकार की मदद करते रहते हैं। मैंने पिताजी से 1050 रुपये माँगे। उन्होंने तुरन्त ही ग्यारह सौ रुपये मुझे दे दिये और यह भी नहीं पूछा कि किसके लिए रुपये चाहिए।

इस घटना ने मेरे हृदय को झकझोर दिया था कि किसी जरूरत के समय पैसा न होने से किस संकट से गुजरना पड़ सकता है। मैं उसी मेडीकल की दुकान पर गया और पचास रुपये देकर अपनी घड़ी वापस ली।

फिर उस दुकानदार को विश्वास में लेकर एक हजार रुपये उसके पास जमा कराये कि इस प्रकार का परेशान कोई भी व्यक्ति उसकी दुकान पर दवा लेने आये और उसके पास रुपये कम हों तो इन रुपयों में से उसकी पूर्ति कर दे। उसने हर्षित होकर मुझे धन्यवाद दिया। मैंने उसको अपना मोबाइल नम्बर दिया कि रुपये समाप्त हो जायें तो मुझे फोन कर दे। मैं तुरन्त ही पैसे जमा करा दिया करूँगा। इस प्रकार यह छोटी-सी मदद मेरी तरफ से चलती रहेगी।

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इस घटना ने मेरा हृदय परिवर्तन कर दिया।

(ii)

‘जहाँ चाह वहाँ राह।’

मनुष्य के सभी कार्य मन से ही संचालित होते हैं। मन में मनन की शक्ति है। मननशीलता के कारण ही मनुष्य को चिन्तनशील प्राणी कहा जाता है। संस्कृत में एक कहावत है- ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो’ अर्थात् मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है। यदि मन न चाहे तो मनुष्य बड़े-से-बड़े बन्धनों की उपेक्षा कर सकता है। मन के चाहने से ही राह बनती है। शंकराचार्य ने कहा है ‘जिसने मन को जीत लिया, उसने जगत को जीत लिया।’ मन की संकल्पशक्ति से व्यक्ति को राह मिल जाती है अर्थात् वह अपने कार्य में सफल हो जाता है। अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिसमें मन की संकल्पशक्ति के द्वारा व्यक्तियों ने अपनी हार को विजय में परिवर्तित कर दिया। महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की जीत का कारण था कि श्रीकृष्ण ने उनके मनोबल को दृढ़ कर दिया था। नचिकेता ने चाहा कि वह मृत्यु पर विजय प्राप्त करे और आत्मा का रहस्य जान सके।

यमराज के द्वारा उसे आत्मा का रहस्य समझाया गया। सावित्री ने अपने मनोबल की चाह से यमराज से अपने मरे हुए पति की आत्मा को वापस प्राप्त कर लिया। महाराणा प्रताप ने अपनी दृढ़ मनःशक्ति से अकबर की सेना से लोहा लिया। तेनसिंह चाहता था कि वह एवरेस्ट की चोटी पर चढ़कर विजय प्राप्त करे। उसने कोशिश की और एवरेस्ट की चोटी पर विजय प्राप्त कर ली।

मेवाड़ का इतिहास वीरता से भरा पड़ा है। वहाँ का क्रूर शासक बनवीर निष्कंटक राज करना चाहता था। उसने यह योजना बनाई कि शहर में एक रात दीपदान और नाच-गान के उत्सव का आयोजन करवाया जाये। उसका लक्ष्य था कि जब जनता इस उत्सव में व्यस्त होगी तब वह महाराणा और मेवाड़ के उत्तराधिकारी बालक उदयसिंह को मार देगा और निष्कंटक राज्य करेगा। शहर में यह उत्सव चल रहा था और लोग आनन्द में व्यस्त थे।

इधर राजमहल में उदयसिंह की धाय ‘पन्ना’ उसकी रक्षा और देखभाल के लिए थी। वह एक देशभक्त क्षत्राणी थी। वह बनवीर की क्रूरता से परिचित थी। पन्ना धाय का बेटा चन्दन उदयसिंह की आयु का ही था और वे दोनों उसी राजमहल में पन्ना की देखरेख में रहते थे। पन्ना को शक था कि दीपदान के उत्सव में बनवीर कुछ काण्ड कर सकता है। तभी एक दासी ने उसे बताया कि बनवीर ने महाराणा का कत्ल कर दिया है और वह उदयसिंह के महल की तरफ आ रहा है। पन्ना प्राणपण से उदयसिंह को बचाना चाहती थी। उसने अपने पुत्र चन्दन को उदयसिंह के राजसी वस्त्र पहनाकर कुँवर उदयसिंह के पलंग पर सुला दिया। तभी कीरत बारी एक बड़ी टोकरी लेकर जूठी पत्तल उठाने के लिए आया। वह भी मेवाड़ को बहुत प्रेम करता था।

पन्ना ने उससे कहा कि वह मेवाड़ के कुँवर की रक्षा करे। तब पन्ना ने सोते हुए उदयसिंह को कीरत की टोकरी में रख दिया और ऊपर से पत्तलों से ढक दिया तथा उसे बताये हुए स्थान पर मिलने को कहा। महल के बाहर अनेक सैनिक तैनात थे, लेकिन कीरत को किसी ने टोका नहीं और वह वहाँ से आसानी से निकल गया। उसके बाद बनवीर हाथ में तलवार लेकर आया और पन्ना को लालच देकर उदयसिंह के बारे में पूछा। पन्ना ने उससे बहुत गुहार लगाई, लेकिन वह नहीं माना। तब पन्ना ने उँगली के इशारे से पलंग की ओर संकेत किया जिस पर उसका पुत्र चन्दन सो रहा था। बनवीर ने एक ही बार में उस बालक का काम तमाम कर दिया। पन्ना चीत्कार करके वहीं गिर पड़ी। उसका ऐसा बलिदान इतिहास में स्वर्ण-अक्षरों में लिखा गया।

फिर पन्ना उस स्थान पर पहुँची जहाँ कीरत को पहुँचने को कहा था। फिर वह कुँवर उदयसिंह को लेकर पड़ोसी मित्र राज्य में चली गई जहाँ उदयसिंह का पालन हुआ। पन्ना ने सच्चे मन से जो चाहा वह पूरा हुआ। अतः हम कह सकते हैं-

‘जहाँ चाह वहाँ राह।’

प्रश्न 2.    (ISC Hindi 2016 Class-12)
Read the following passage and briefly answer the questions that follow :
निम्नलिखित अवतरण को पढ़कर, अन्त में दिये गए प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर लिखिए-

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विनम्रता तथा सरलता ऐसे गुण हैं जो हमें सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाते हैं। विनम्रता मानव को उसके दिव्य स्वभाव से जोड़ती है। उसे दूसरों के प्रति सहृदय बनाती है। वह सरलता से प्रेरित होकर विपत्ति में पड़े मनुष्यों की मदद करता है। स्वयं अभाव में रहकर भी दूसरों की यथासंभव सहायता करता है। विनम्र व्यक्ति की वाणी बड़ी मधुर होती है। इनके मृदुवचन मन की कटुता को समाप्त करते हैं। वाणी की मिठास के कारण इनके अनेकानेक मित्र बन जाते हैं। लोग इस प्रकार के व्यक्तियों से चाहे जितने भी क्रोध में बात करें, विनम्रता का जादू क्षणभर में क्रोध को शांत कर देता है। अतः इस प्रकार विनम्रता बड़ी सहजता से क्रोध जैसे बड़े मनोविकार पर भी विजय प्राप्त कर लेती है। ये व्यक्ति समाज के लिए मार्गदर्शक बन जाते हैं। इनकी सरलता में जो स्वाभाविकता होती है वह लोगों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती है। इनका अनुकरण करने का प्रयास सभी करते हैं। जिससे वे भी विनम्रता को अपने जीवन में अपनाकर अपना जीवन सफल बना सकें। ईर्ष्या, द्वेष, घृणा जैसे मनोविकार को पराजित कर पाएं।

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