ISC Hindi 2016 Class-12 Previous Year Question Papers

ISC Hindi 2016 Class-12 Previous Year Question Papers Solved for practice. Step by step Solutions with Questions. By the practice of Hindi 2016 Class-12 Solved Previous Year Question Paper you can get the idea of solving.

Try Also other year except ISC Hindi 2016 Class-12 Solved Question Paper of Previous  Year for more practice. Because only ISC Hindi 2016 Class-12 is not enough for complete preparation of next council exam. Visit official website CISCE for detail information about ISC Class-12 Hindi.

ISC Hindi 2016 Class-12 Previous Year Question Papers Solved


-: Select Your Topics :-

Sections-A


Previous Year Question Papers Solved for ISC Hindi 2016 Class-12 

Section-A-Language (50 Marks)

प्रश्न 1.
Write a composition in Hindi in approximately 400 words on any ONE of the topics given below: [20] निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर लगभग 400 शब्दों में हिन्दी में निबन्ध लिखिए
(a) “भूकम्प प्रकृति का वह विनाशकारी रूप है जिसकी कल्पना भी मनुष्य-मन को चोट पहुँचाती है।”- इस कथन को ध्यान में रखते हुए उस समय का वर्णन कीजिए जब आपके नगर में भूकम्प आया, उसका आम जन जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? आपने तथा आपके साथियों ने राहत कार्यों में क्या योगदान दिया। विस्तार से लिखिए।
(b) अपराधी को नहीं बल्कि अपराध को समाप्त करने से एक मजबूत राष्ट्र तैयार होता है। इस विषय के पक्ष या विपक्ष में अपने विचार लिखिए।
(c) “बालश्रम समाज पर एक अभिशाप है।” इस विषय को ध्यान में रखते हुए उन बच्चों की जरूरतों और मजबूरियों पर एक प्रस्ताव लिखिए।
(d) “अहंकार से वृद्धि रुक जाती है।” इस विचार को अपने जीवन की घटना के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
(e) “योग स्वस्थ जीवन का आधार”- विवेचन कीजिए।
(f) निम्नलिखित विषयों में से किसी एक पर मौलिक कहानी लिखि-

(i) कहानी का अन्तिम वाक्य होगा ……
इस घटना ने मेरा हृदय परिवर्तन कर दिया।
(ii) “जहाँ चाह वहाँ राह।” कहावत को आधार बनाकर
एक कहानी लिखिए।
उत्तर- 1
(a)

भूकम्प    (ISC Hindi 2016 Class-12)

पृथ्वी का अपनी धुरी से हिलकर कम्पन करने की स्थिति को भूकम्प या भूचाल कहा जाता है। कभी-कभी तो यह स्थिति बहुत भयावह हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी के ऊपर स्थित जड़-चेतन, हर प्राणी और पदार्थ का या तो विनाश हो जाता है या फिर वह सर्वनाश की-सी स्थिति में पहुँच जाता है। जापान के विषय में तो प्रायः सुना जाता है कि वहाँ तो अक्सर भूकम्प आकर विनाशलीला प्रस्तुत करते ही रहते हैं। इस कारण लोग वहाँ लकड़ियों के बने घरों में रहते हैं। इसी प्रकार का एक भयानक भूकम्प बहुत वर्षों पहले अविभाजित भारत के क्वेटा नामक स्थान पर आया था। उसने शहर के साथ-साथ हजारों घर-परिवारों का नाम तक भी बाकी नहीं रहने दिया था।

अभी कुछ वर्षों पहले गढ़वाल और महाराष्ट्र के कुछ भागों को भूकम्प के दिल दहला देने वाले हादसों का शिकार होना पड़ा था। प्रकृति की यह कैसी लीला है कि वह मानव-शिशुओं के घरघरौंदों को तथा स्वयं उनको भी कच्ची मिट्टी के खिलौनों की तरह तोड़-मरोड़कर रख देती है। पहले यह भूकम्प गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों में आया था, जहाँ इसने बहुत नुकसान पहुँचाया था। थोड़े दिनों पश्चात् महाराष्ट्र के लातूर में फिर एक भूकम्प आया जिसने वहाँ सब कुछ मटियामेट कर दिया था।

26 जनवरी, 2001 को गुजरात सहित पूरे भारत ने भूकम्प का कहर देखा। भुज सहित सम्पूर्ण गुजरात में भारी जान-माल का नुकसान हुआ। 8 अक्टूबर, 2005 को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और उससे सटे भारतीय कश्मीर में दिल दहला देने वाला भूकम्प आया। उसमें जहाँ एक लाख से अधिक लोग काल के गाल में समा गये, वहीं लाखों लोग घायल हुए तथा अरबों रुपये की सम्पत्ति की भी हानि हुई।

भूकम्प वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी तक ऐसा कोई उपकरण या यन्त्र विकसित नहीं हुआ है जिससे यह बात पता चल सके कि अमुक-अमुक क्षेत्रों में भूकम्प आने वाला है। भूकम्प के आते समय ‘रिक्टर स्केल’ पर सिर्फ उसकी क्षमता का ही माप लिया जा सकता है।

गुजरात के भूकम्प को देखकर वहाँ अफरा-तफरी मच गई। आँखों-देखी इस भयंकर दुर्घटना ने सभी लोगों के मन में एक प्रश्न खड़ा कर दिया कि आखिर गुजरात प्रान्त का क्या होगा? वहाँ जनहानि और धन हानि का अनुमान ही लगाना कठिन था। भूकम्प आने के बाद गुजरात प्रान्त की स्थिति एक श्मशान घाट या कब्रिस्तान की भाँति हो गई थी। हम पाँच छात्र किसी परीक्षा के लिए वहाँ गये थे। हम एक होटल में ठहरे थे। हमें जैसे ही पता लगा तो हम लोग बाहर निकल आये और उस स्थान की तरफ बढ़े जहाँ से चीख-पुकार या भयंकर शोर शराबा हो रहा था। लोग उधर दौड़े जा रहे थे। हम भी भागकर वहाँ पहुँचे और पीड़ित लोगों की मदद की। पुलिस, एम्बुलैंस और फायरब्रिगेड की गाड़ियाँ आ चुकी थीं। उस भयंकर दृश्य को देखकर प्राण सूख रहे थे। हम पाँचों छात्रों ने हिम्मत नहीं हारी और घायलों को एम्बुलैंस में बिठाया। दबे हुए लोगों को मलवा हटाकर बाहर निकाला। मृतकों के ढेर देखकर करुणा भी रोने लगी। ऐसी त्रासदी भगवान किसी देश को न दे।

ऊपरी सतह से लेकर अन्तर्भाग तक पृथ्वी कई परतों से बनी हुई है। पृथ्वी की बाहरी सतह कई कठोर खण्डों या विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित है जो क्रमशः कई लाख सालों की अवधि में पूरे सतह से विस्थापित होती है। पृथ्वी की आन्तरिक सतह एक अपेक्षाकृत ठोस भूपटल की मोटी परत से बनी हुई है और सबसे अन्दर होता है एक कोर, जो एक तरल बाहरी कोर और एक ठोस लोहे की आन्तरिक कोर से बनी हुई है। बाहरी सतह की जो विवर्तनिक प्लेट हैं वे बहुत धीरे-धीरे गतिमान हैं।

ये प्लेट आपस में टकराते भी हैं और एक-दूसरे से अलग भी होते हैं। ऐसी स्थिति में घर्षण के कारण भूखण्ड या पत्थरों में अचानक दरारें फूट सकती हैं। इस अचानक तेज हलचल के कारण जो शक्ति उत्सर्जित होती है, वही भूकम्प के रूप में तबाही मचाती भूकम्प भूस्खलन और हिम स्खलन पैदा कर सकता है, जो पहाड़ी और पर्वतीय इलाकों में क्षति का कारण हो सकता है। भूकम्प के कारण किसी विद्युत लाइन के टूटने के कारण आग लग सकती है। भूकम्प के कारण मिट्टी द्रवीकृत हो सकती है जिससे इमारतों और पुलों को नुकसान पहुँच सकता है। समुद्र के अन्दर भूकम्प से

सुनामी आ सकती है। भूकम्प से क्षतिग्रस्त बाँध के कारण बाढ़ आ सकती है। भूकम्प से जीवन की हानि, सम्पत्ति की हानि, मूलभूत आवश्यकताओं की कमी, रोग इत्यादि होते हैं।

यह एक प्राकृतिक आपदा है। हमें इससे अपनी रक्षा के उपाय करने चाहिए। जापान आदि देशों में जहाँ भूकम्प अधिकतर आते हैं वहाँ लोग लकड़ी या बाँस के मकान बनाते हैं जिससे कि जनहानि कम होती है।

(b)

राष्ट्र विकास के लिए अपराधी नहीं,   
अपराध की समाप्ति

पक्ष : अपराधी को अपराध करने से पहले अपराध का बोध होता है और उसके दण्ड का भी आभास होता है। अपनी आत्मा, समाज और कानून व्यवस्था के विरुद्ध जो कार्य किया जाता है वह अपराध की श्रेणी में आता है। कोई इन्सान अच्छा बुरा नहीं होता, बल्कि हालात उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं। कुछ अपराध ऐसे होते हैं जो धर्म के विरुद्ध किये जाते हैं, कुछ अपराध समाज के विरुद्ध किये जाते हैं, कुछ व्यक्ति विशेष को हानि पहुँचाने के लिए किये जाते हैं और कुछ अपराध स्वयं को लाभ पहुँचाने के लिए किये जाते हैं। अपराध तो अपराध है वह चाहे किसी भी कारण से किया गया हो। कानून की दृष्टि में प्रत्येक अपराध के लिए दण्ड निहित है।

साधु-सन्तों और मनीषियों ने कहा है कि पापी से नहीं पाप से घृणा करो। कई ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिनमें अपराधी ने अपराध छोड़कर समाज के हित में कार्य किये। अपराधी को समाज और कानून द्वारा सुधरने का अवसर प्रदान करना चाहिए। यदि वह जुर्म छोड़कर देश हित में कार्य करता है तो इससे राष्ट्र के निर्माण में सहायता मिलेगी। जो उच्चकोटि का अपराधी होता है उसमें मजबूत आत्मिक शक्ति होती है। यदि वह शक्ति देश के निर्माण में लग जाये तो कितना भला होगा राष्ट्र का। अतः अपराधी की स्थिति को समझकर उसकी कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। उसे कानून से भी कुछ सुविधाएँ दी जायें और उसे समाज सेवा का बोध कराया जाये तो अवश्य ही उसका हृदय परिवर्तन होगा और वह जुर्म का मार्ग छोड़कर विकास के मार्ग पर चलेगा।

आजकल बड़े-बड़े डाकू तो अपने अपराध मार्ग से विरत हो गये हैं, लेकिन छोटे-मोटे अपराधी अपने गलत कार्यों में संलग्न हैं।

संत विनोबा भावे ने एक ‘भूदान’ आन्दोलन चलाया जिसमें किसानों से थोड़ी-थोड़ी जमीन लेकर भूमिहीनों को दी जाती थी। यह आन्दोलन सफल रहा। इसी दौर में डाकुओं के आत्मसमर्पण का कार्य भी तेजी से चला। जितने भी नामी डाकू थे उन्होंने अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया। कानून ने उदारता से उनका साथ दिया और अपनी सजा काटकर जब वे आये तो उन्हें गाँवों में जमीन और घर दिये गये जिससे कि वे एक साधारण नागरिक की तरह अपना जीवन व्यतीत करने लगे। यह था विनाश से निर्माण की ओर आना। भगवान बुद्ध के समय एक अंगुलिमाल डाकू हुआ था जिसने एक हजार व्यक्तियों की हत्या करने का प्रण लिया था। संख्या गिनने के लिए वह जो आदमी मारता था उसकी एक अंगुली काटकर उसकी माला बनाकर अपने गले में पहन लेता था। जनता उसके डर के मारे त्राहि-त्राहि कर उठी थी।

जिस जंगल में वह रहता था वहाँ राजा ने एक पहरेदार बैठा दिया था कि उस जंगल से होकर कोई यात्री न जाये। राजा ने भगवान बुद्ध से उसके आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। भगवान बुद्ध उस जंगल में गये और अंगुलिमाल के सामने निडर होकर प्रसन्न मुद्रा में खड़े हो गये। अंगुलिमाल को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसके सामने आते ही लोगों की घिग्घी बँध जाती है, लेकिन यह व्यक्ति निडर होकर खड़ा है। कहते हैं भगवान बुद्ध ने उसे उपदेश दिया जिसे सुनकर उसने अपनी कटार भगवान बुद्ध के चरणों में रख दी और उनका शिष्य बनकर अहिंसा के मार्ग पर चलने लगा। इससे हमें यह बोध होता है कि भगवान बुद्ध ने भी अपराधी को नष्ट नहीं किया, बल्कि उसके अपराध को नष्ट किया।

इसी सन्दर्भ में एक कहानी याद आती है कि एक बड़े शहर के चर्च में एक सहृदय विशप रहते थे। लोगों का भला करना ही मानो उनके जीवन का उद्देश्य था। एक दिन एक अपराधी जेल से छूटकर आया और कहीं ठिकाने की तलाश में चर्च के द्वार पर आकर बैठ गया। विशप ने जब देखा कि यह कोई दुखियारा है तो उसे अपने कमरे में ले गये। भोजन कराने के बाद उसे सोने के लिए स्थान दिया। जब विशप सो गये तो यह अपराधी उठा तो उसने चाँदी की कैण्डिल स्टिक देखी। वे चार थीं और वजन में भारी। पहले तो उसने सोचा कि विशप को मार दूं और ये कैण्डिल स्टिक ले लूँ। फिर उसके मन में विचार आया कि इस भले आदमी को क्यों मारूँ सिर्फ कैण्डिल स्टिक लेकर चलूँ। उसने ऐसा ही किया, किन्तु रात में पुलिस ने उसे पकड़ लिया और उन कैण्डिल स्टिकों को पहचान लिया।

सुबह पुलिस वाले उस चोर को पकड़कर विशप के पास लाये और उनसे पूरी बात कही। विशप समझ गये कि इस गरीब आदमी को उन चाँदी की कैण्डिल स्टिक की ज्यादा आवश्यकता है। उन्होंने पुलिस से कहा कि उस आदमी को छोड़ दें क्योंकि वे कैण्डिल स्टिक उन्होंने ही उसे दी थीं। पुलिस उसे छोड़कर चली गई। अब वह चोर विशप के पैरों में पड़ गया। उसने अब से कोई अपराध न करने की कसम खाई और वहीं चर्च में सेवा करने लगा।

इन तथ्यों से पता चलता है कि अपराधी को नहीं बल्कि अपराध को समाप्त करने से मजबूत राष्ट्र तैयार होता है।

विपक्ष : यह कथन सत्यता से कोसों दूर है क्योंकि अपराधी अपने अपराध को कभी नहीं छोड़ता। यदि ऐसा होता, तो सजा काटकर आये अपराधी फिर से अपराध नहीं करते, सजा काटकर
आया हुआ व्यक्ति और अधिक जुर्म करता है। उसका हृदय इतना – कठोर हो जाता है कि उसे बदलना मुश्किल नहीं असम्भव है।

साधु संन्यासियों की बात आज कौन सुनता और मानता है? यदि अपराध समाप्त करने से अपराधी समाप्त हो जाता तो अब तक भारत में अपराध देखने को नहीं मिलता। भारत क्या सभी देशों में आज आतंकवादी माहौल के कारण साँस लेना भी दूभर हो रहा है। क्या आतंकवादियों का हृदय परिवर्तन सम्भव है? कभी नहीं प्राचीनकाल में अपराध के कठोर दण्ड नियत थे इसलिए अपराधों की संख्या न के बराबर थी। चोरी करने पर चोर के हाथ काट दिये जाते थे। अतः लोग अपने घरों में ताले नहीं लगाते थे। अपराधी को कठोर दण्ड देने या उसे मृत्युदण्ड देने से उसके साथ-साथ उसके साथियों द्वारा किया जाने वाला अपराध भी समाप्त हो जाता है।

प्रात:काल जज साहब भ्रमण के लिए जा रहे थे तभी उन्होंने। देखा कि एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को चाकू मार दिया और भाग गया। कुछ हफ्तों बाद उसी हत्या का मुकदमा उन्हीं जज साहब के कोर्ट में आया। जज साहब को आश्चर्य हुआ कि खून के इल्जाम में पकड़ा गया आदमी कोई और व्यक्ति है, वह व्यक्ति नहीं जिसको जज साहब ने देखा था। सारे सबूत उस पकड़े गये व्यक्ति के खिलाफ थे। जज साहब ने फैसला देने से पहले उस पकड़े गये व्यक्ति को अकेले में बुलाया और उससे पूछा कि तुम इस केस में कैसे फँस गये। खून तुमने नहीं किसी और ने किया है, लेकिन सारे सबूत तुम्हारे खिलाफ हैं। उस व्यक्ति ने शान्तिपूर्ण ढंग से उत्तर दिया कि जज साहब आप सबूतों के आधार पर अपना निर्णय दें, वह व्यक्ति जिसने खून किया है वह इस बार तो बच गया है, लेकिन आगे पकड़ा जायेगा जैसे मैं कई बार बच गया हूँ, पर इस बार पकड़ा गया। यह सुनकर जज साहब अवाक रह गये और ऊपर भगवान के न्याय की ओर देखने लगे।

यदि हम इस आशा में कि अपराधी सुधर जायेंगे, उन पर दयाकर उन्हें छोड़ दें तो यह कभी सम्भव नहीं है। हम अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। अपराधियों के अपराध समाप्त करने के लिए उनके लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था करनी होगी।

(c)

‘बालश्रम समाज पर एक अभिशाप है’      (ISC Hindi 2016 Class-12)

“बालश्रम समाज पर एक अभिशाप है।” यह कथन इस सत्य को प्रतिपादित करता है कि ‘बालश्रम’ समाज पर एक कलंक है। यह एक अपराध है जिसमें कि बच्चों को जबरदस्ती काम करने पर लगा दिया जाता है और उनको आर्थिक जिम्मेदारी बड़ों की तरह उठाने को मजबूर किया जाता है। ‘इण्टरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन’ (ILO) के अनुसार पन्द्रह वर्ष की उम्र से कम के बच्चों को धन कमाने के कार्यों में लगाना एक अपराध है। इससे बच्चे अपनी शिक्षा, स्वास्थ्य, मानसिक और सामाजिक स्वतन्त्रता से वंचित रह जाते हैं। इस प्रकार बाल श्रम के चलते हुए उनका भविष्य बर्बाद हो रहा है। इस पर दुनिया के सभी देश गम्भीरता से विचार कर रहे हैं।

बालश्रम की समस्या विकासशील देशों में अधिक पायी जाती है। विकासशील देशों में गरीबी के कारण बच्चों को कम उम्र में ही मजदूरी, घरों में काम आदि करना पड़ता है। जिसके कारण वे अपनी शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक स्वतन्त्रता तथा अपने बचपन से वंचित रह जाते हैं। दुनिया के सभी विकासशील देश इस समस्या को . सुलझाने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं, लेकिन चोरी-छिपे यह रोजगार धड़ल्ले से चल रहा है। समाज का बड़ा तबका बाल श्रम का भरपूर फायदा ले रहा है। लाखों बच्चे बालश्रम की चपेट में आकर अपना जीवन चौपट कर रहे हैं। ये बच्चे ही भारत का भविष्य हैं जो बिगड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। भारतीय कानून के अन्तर्गत 15 साल से कम के बच्चों से काम लेना जुर्म है। ये जुर्म बच्चों के माता-पिता, कारखानों के मालिक, रेस्टोरेन्ट के मालिक और घर के मालिक, दुकानदार, दस्तकार, बुक बाइंडर आदि खुले रूप से कर रहे हैं। जिससे बच्चों का जीवन नष्ट हो रहा है और इसकी चिन्ता किसी को नहीं है।

बालश्रम बढ़ने के निम्न कारण हैं जो इस श्रम को कम नहीं होने देते-    (ISC Hindi 2016 Class-12)

  1. गरीबी और बढ़ती हुई बेरोजगारी विकासशील देशों में बालश्रम को जन्म दे रही है।
  2. विश्व संगठन की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के एकचौथाई लोग अत्यन्त गरीब हैं।
  3. शिक्षा की कमी है जिसे अधिकतर बच्चे प्राप्त नहीं कर पाते।
  4. विकासशील देश के लोग बालश्रम के कानून को तोड़कर बालश्रम को बढ़ावा दे रहे हैं।
  5. समाज का पूर्ण नियन्त्रण खेती पर काम करने वाले बच्चों पर और घर में काम करने वाले बच्चों पर नहीं है।
  6. बालश्रम करने वाले बच्चे अपने परिवार की दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए इसे महत्व देते हैं और इसके ऊपर वे कुछ और सोचते ही नहीं हैं।
  7. व्यापारिक संगठन और गृह उद्योग छोटे बच्चों को नौकरी पर रख लेते हैं, ताकि कम कीमत में ज्यादा काम ले सकें। वे बच्चों को प्रोत्साहित करते हैं और छोटे बच्चे उसी को अपना भाग्य मानकर स्वीकार कर लेते हैं।

बाल श्रम की समस्या को सुलझाने के लिए उपाय-    (ISC Hindi 2016 Class-12)

  1. समाज में फैली इस कुप्रथा को बन्द करने के लिए हमें नये सिरे से प्रयास करने होंगे।
  2. बालश्रम को समाप्त करने के लिए समाज में ऐसी इकाइयाँ बनें जो बालकों के श्रम पर ध्यान देकर बालकों को उस काम के प्रति निरुत्साहित करें और उनके पढ़ने की निःशुल्क व्यवस्था करें।
  3. बच्चों के माता-पिता को उनकी पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करें।
  4. समाज में जागृति उत्पन्न की जाये जिसका परिणाम बाल श्रम से छुटकारा हो।
  5. सरकार उन गरीब परिवारों की कुछ आर्थिक सहायता करे जिनके बच्चे गरीबी के कारण बालश्रम में लग जाते हैं।
  6. सरकार बालश्रम समाप्ति के लिए कड़े कानून बनाये जिसमें माता-पिता और जहाँ बच्चे काम करते हैं उनको दण्ड देने का प्रावधान हो।

भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी जिन्होंने बाल श्रम को रोकने के लिए अपना पूर्ण सहयोग दिया तथा इसके लिए उन्हें विश्व का सर्वश्रेष्ठ सम्मान ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला। ये मध्य प्रदेश में पैदा हुए और अपनी शिक्षक की नौकरी त्यागकर ‘बालश्रम’ की समाप्ति के कार्य में लग गये। 1980 में इन्होंने ‘बचपन बचाओ’ आन्दोलन चलाया। 144 देशों में इन्होंने लगभग 83,000 बच्चों को बालश्रम से उबारा और उनकी शिक्षा आदि का भी सरकारों के सहयोग से प्रबन्ध किया।

बालश्रम एक बड़ी सामाजिक समस्या है। इसको माता-पिता, अध्यापक, सामाजिक कार्यकर्ता और सरकार मिलकर सुलझा सकते हैं। बच्चों को शिक्षित बनाया जाये और उनकी कमाने वाली मानसिकता को सुधारा जाये।

(d)

‘अहंकार से वृद्धि रुक जाती है’      (ISC Hindi 2016 Class-12)

‘अहंकार से वृद्धि रुक जाती है’ यह उक्ति अक्षरशः सत्य है। अहंकार एक ऐसा अवगुण है जो मनुष्य के हृदय और मस्तिष्क पर हावी रहता है और उसे उसका भान भी नहीं होता। वह उसके मार्ग में प्रतिपग बाधा उत्पन्न करता है। अन्य मनुष्य ही समझ पाते हैं कि अमुक मनुष्य अहंकारी है अतः वे उससे दूरी बनाकर रखते हैं। अहंकार न दिखाई देते हुए भी स्पष्ट परिलक्षित हो जाता है। अहंकार अहंकारी व्यक्ति को भरोसा दिलाता है कि उसके सब काम अहंकार के कारण ही होंगे पर होता इसके विपरीत ही है। मनुष्य का जीवन अपने आस-पास के वातावरण से प्रभावित होता है। मूलरूप से मानव के विचारों और कार्यों को उसके संस्कार, वंश परम्पराएँ ही दिशा दे सकती हैं, अहंकार नहीं। यदि उसे अच्छा वातावरण मिलता है तो वह श्रेष्ठ कार्यों को सम्पादित करता है। यदि अपने अहंकार के कारण उसे उचित वातावरण सुलभ नहीं हो पाता है तो उसके कार्य भी उससे प्रभावित होते हैं।

Read Next 👇 Click on Page Number Given Below 👇

You might also like
Leave a comment