ISC Hindi 2018 Class-12 Previous Year Question Papers

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ISC Hindi 2018 Class-12 Previous Year Question Papers Solved


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Sections-A

Section-B

Gadya Sankalan

Kavya Manjari

Saara Akash


Maximum Marks: 100

Time Allowed: Three Hours

(Candidates are allowed additional 15 minutes for only reading the paper. They must NOT start writing during this time.)
Answer questions 1, 2 and 3 in Section A and four other questions from Section B on at least three of the prescribed textbooks. The intended marks for questions or parts of questions are given in brackets [ ].


Previous Year Question Papers Solved for ISC Hindi 2018 Class-12 

Section-A-Language (50 Marks)

प्रश्न 1.
Write a composition in approximately 400 words in Hindi on any ONE of the topics given below: [20] किसी एक विषय पर निबंध लिखिए जो 400 शब्दों से कम न हो:
(i) आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में आदमी मानसिक तनाव से ग्रस्त है, इसे दूर करने तथा जीवन को खुशहाल बनाने के तरीकों के बारे में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
(ii) ‘कर्म की प्रबल है, भाग्य नहीं’- इस कथन के पक्ष या विपक्ष में अपने विचार प्रकट कीजिए।
(iii) आज के भौतिकवादी युग में त्योहारों का रूप-स्वरूप बदल रहा है। त्योहारों में व्यावसायिकता बढ़ती जा रही है।’ इस तथ्य की विवेचना कीजिए।
(iv) ‘जीवन में सफलता पाने के लिए कठिन संघर्ष की आवश्यकता होती है’-इस कथन को अपने जीवन के किसी निजी अनुभव के द्वारा पुष्ट कीजिए।
(v) ‘नारी घर और बाहर दोनों जगह अपनी भूमिका निभाते हुए नित नई चुनौतियों का सामना करती है।’ विभिन्न क्षेत्रों में नारी के योगदान को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर अपने विचार लिखिए।
(vi) निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर मौलिक कहानी लिखिए:
(a) ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’।
(b) एक ऐसी मौलिक कहानी लिखिए जिसका अंतिम वाक्य हो:
…………….. काश! ऐसा पल मेरे जीवन में भी आया होता।।
उत्तर-1
(i) यह कटुसत्य है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में आम आदमी तनावग्रस्त हो रहा है। वह कम समय में अधिक-से-अधिक पाना और बड़े से बड़ा व्यक्ति होना चाहता है। भौतिकवाद ने इसे और भी तनावग्रस्त बना दिया है। हम अपने शारीरिक तथा मानसिक विकास से कोसों दूर होते जा रहे हैं।

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मेरे विचार से आज के विभिन्न तनावों से मुक्त होकर स्वस्थ व संपूर्ण जीवन का आनंद लेने के लिए साहित्य, संगीत एवं कला का सहारा लेना चाहिए।

जब से मानव सभ्यता का विकास हुआ है तब से मनोरंजन के नए-नए तरीके अपनाए जा रहे हैं। साहित्य, संगीत एवं कला का मानव जीवन में विशिष्ट स्थान है। इनसे न केवल मनोरंजन होता है अपितु हमारे विकार भी दूर होते हैं। हमें नई प्रेरणाएँ मिलती हैं और हम उदात्त, उदार, सत्याधारित एवं निश्छल जीवन की ओर उन्मुख होने लगते हैं। ये हमारी सद्वृत्तियों को जगाने और पल्लवित करने वाले उपकरण हैं।

सर्वप्रथम साहित्य की बात की जाए साहित्य का अर्थ ही मनुष्य का हित-साधन है। मानव का स्वभाव है कि वह सीधे-सीधे दिए जाने वाले उपदेशों को ग्रहण नहीं करता। वही उपदेश जब निहित संदेश के रूप में साहित्य के माध्यम से दिए जाते हैं तो मनुष्य का साधारणीकरण हो जाता है। वह स्वयं को साहित्यिक परिवेश के अनुसार ढालने लगता है। वह उन स्थितियों, घटनाओं, पात्रों या भावनाओं को हृदय में स्थान दे देता है। उसे खल पात्रों और सज्जनों का बोध होने लगता है। धीरे-धीरे वह सत्साहित्य के माध्यम से अपने आपको ऊपर उठता अनुभव करता है।

कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्यकार अपने समाज में जो कुछ भी अच्छाबुरा देखता है उसे अपनी आँख अर्थात् दृष्टिकोण से मंडित और सिंचित करके साहित्य की अलगअलग विधाओं के माध्यम से अभिव्यक्त कर डालता है। उपन्यास, कहानी, कविता, एकांकी, नाटक, संस्मरण, रेखाचित्र, निबंध, रिपोर्ताज आदि विविध विधाओं को अपनाकर साहित्यकार अपनी बात कहता है। इससे न केवल हमारा मनोरंजन होता है अपितु हमारा ज्ञान भी बढ़ता है। हमारे भीतर स्थितियों का सामना करने, समस्याओं का समाधान खोजने और परिवेश के अनुसार आचरण अपनाने की समझ पैदा होती है।

संगीत को एक श्रेष्ठ एवं लोकप्रिय कला होने का गौरव प्राप्त है। संगीत मनुष्य के स्नायु-तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। इससे हम दिनचर्या के बोझ एवं तनाव से मुक्त हो जाते हैं। प्रायः जन्म से ही मनुष्य को संगीत की समझ होती है। बच्चा जब लोरी सुनता है तो उसे संगीत की समझ नहीं होती। वह अबोध, अपठित तथा अज्ञानी होता है। तथापि उसे आनंद आता है। संगीत का मनुष्य तो मनुष्य पशु-पक्षियों पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि संगीत का दीवाना हिरण शिकारियों द्वारा फैलाए गए संगीत के जाल में फंसकर अपनी जान गँवा बैठता है।

जिस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण है उसी प्रकार कला उसके विभिन्न प्रकार के व्यवहारों की झाँकी कही जा सकती है। आचार्य विभु ने चौंसठ कलाओं का वर्णन किया है। कला हमारे जीवन को निखारती है। यह भावों को प्रस्फुटित करती है। मनुष्य के सुखी जीवन के लिए साहित्य, संगीत और कला अति महत्त्वपूर्ण हैं। साहित्य से ज्ञानवर्धन होता है और कला तथा संगीत से मनोरंजन होता है। कला और संगीत ईश्वर के अलौकिक आनंद की अनुभूति कराते हैं। साहित्य मनुष्य को सत्मार्ग की प्रेरणा देता है। वह उसके चरित्र का निर्माण कर उत्कर्ष पर ले जाता है। कला और संगीत मिलकर अद्भुत आनंद की अनुभूति कराते हैं। हमारे देश की संस्कृति कला और संगीत में छिपी होती है। साहित्य नए समाज का निर्माण करता है। मनुष्य पर साहित्य का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रभाव पड़ता है। उसके सर्वांगीण विकास में साहित्य सहायक होता है। कला में नृत्य, चित्रकला, भवन निर्माण, मूर्ति कला, आदि विधाएँ आती हैं।

भारतीय मान्यता है कि जब सरस्वती ने अपने कोमल हाथों में वीणा धारण की तब सामवेद की रचना हुई, और संगीत के सात स्वरों का प्रादुर्भाव हुआ। धीरे-धीरे संगीत की यह परंपरा विदेशों में पहुँच गई और आज हमें संगीत की दो शैलियाँ पाश्चात्य संगीत और भारतीय संगीत के रूप में मिलती हैं। चाहे संगीत किसी भी शैली का क्यों न हो, उसका उद्देश्य मनुष्य को सुख और आनंद प्रदान करना ही होता है। संगीत सुनने व सीखने से मनुष्य को बहुत लाभ होते है।

संगीत के अंदर नवजीवन प्रदान करने की अद्भुत क्षमता होती है। जब थका-हारा मनुष्य कुछ समय संगीत का आनंद प्राप्त करता है तो उसकी सारी थकान दूर हो जाती है और वह स्वयं को तरोताजा अनुभव करने लगता है। गीत-संगीत और नृत्य तो प्राचीन काल से ही मनोरंजन के साधन माने गए हैं। आज भी यदि इस व्यस्त जीवन शैली में मनुष्य रोज सैर-सपाटे के लिए नहीं जा सकता है तो वह अपने घर में ही संगीत का आनंद प्राप्त करके मनोरंजन कर सकता है।

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